Skip to main content

वो न समझी

"वो न समझी"' Jitendra Rai
वह चिड़िया थी। उड़ती थी खुली वादियों में। मैं नींद में उनींदा। वह चहचहाई तो नींद से जागा, अपना भाग्य तलाशा। मुस्कुराने लगा। जीने की राह मिल गई थी। मैंने भी चहचहाने की कोशिश की तो उसकी चहचहाहट बन्द हो गई। उसे दुख था। यूँ ही चहचहाती थी, उसके अंदर मरती जिंदगी को देख लिया था मैंने। नहीं समझा पाया उसे कि साथ चलेंगे तो दुख साझा होगा। वो न समझी। उड़ गई फिर खुली वादियों में चहचहाते हुए, आँसू सिर्फ मैं ही देख पाया।
@ Short stories by Jitendra Rai.
Short story, Hindi laghu katha, लघु कथाएं। लघु कथा, जितेंद्र राय की लघु कथाएं, उत्तराखंड साहित्य, गढ़वाल, गढ़वाली लेखक,पहाड़ी।

Comments

Popular posts from this blog

Garhwali Poem

"तु चलदी रै"         Jitendra Rai उलझी गे जिंदगी ककड़ी का  लगुला जन, पर तु फूल अपड़ी  मुखड़ि पर ही आण दे। घूमि गे जिंदगी भागीरथी सी यूँ आंख्युं क्वी दोष नी तु पाणी गोमुख  थैं ही बुगाण दे। भरपाई नि ह्वे सकदी जु खुयालि तिल पर उठण त पोड़लो ही हिमालय सी हिम्मत अफ फर बि आण दे। सवाल पुछद नियति हर मोड़ पर जिंदगी का तिल जाण कने च? बस तू चलदी रै किस्मत थैं अपड़ी छवीं  अफ्फी पुराण दे। ........ जीतेन्द्र राय काव्य। आधुनिक गढ़वाली कवितायेँ। गढ़वाली कवितायेँ। गढ़वाली गीत।। पहाड़ी काव्य। कुमाउँनी कवितायेँ। Poetry by Jitendra Rai.. modern Garhwali poems...pahadi kavitayen...kumauni kavitayen...pahadi geet ..kavitayen pahad ki.

आना उत्तराखंड प्रिये

"आना उत्तराखंड प्रिये"            Jitendra Rai क्यों तपती हो गर्मी में तुम भीग पसीने में फिरती शीत पवन के झोंके लेने आना उत्तराखण्ड प्रिये।      सूखा गला और गर्म हैं सांसे      खौल रहा बोतल बंद पानी      नौले धारों का पानी पीने     आना उत्तराखंड प्रिये। फूल रहा है दम तेरा मुरझा रही मुख की लाली अपने मन की बात बताने आना उत्तराखण्ड प्रिये।      उत्तराखण्ड के बुग्यालों में      पला बढ़ा जीवन मेरा     जीवन को जी भर जीने     आना उत्तराखंड प्रिये। नकली फूलों की नकली लाली देखी है अब तक तुमने फूलों की घाटी में मिलने आना उत्तराखंड प्रिये।       स्विमिंग पूल में तैराकी से       आनंद कहाँ मिला होगा      अलकनंदा में डुबकी लेने     आना उत्तराखंड प्रिये। ऊँचे नीचे शिखरों में चल करेंगे जी भर बातें बुरांस काफल पर प्यार लुटाने आना उत्तराखंड प्रिये। ...........  उत्त्तराखंडी कविताय...

बेसिर पैर

"बेसिर, पैर "  Another absurd उसका नाम रुलदू है, उसे रोते नहीं देखा मैंने कभी। तुम तो हंसमुख हो न, कभी हँस भी लिया करो। कल भीमू मिला था मुझे, शिकार खा रहा था । हड्डियाँ एक तरफ रख रहा था और अपनी हड्डियों में शिकार चढ़ जाने की कामना कर रहा था। सरला ने तो गली में गालियों की बौछार कर रखी है और सरल गणित के कठिन सवालों में उलझा है।राजकुमार की कटोरी में 10 रुपये डाले मैंने तो राजा को भी बुला लाया, मजबूरन उसे भी देने पड़े। रानी बेचारी दूर से देख रही थी। सुना है भोलू चालू हो गया है, भालुओं की खाल का तस्कर है कह रहा था कोई। यह किसी और ने नहीं बल्कि सुरीली ने अपनी कर्कश आवाज में बताया मुझे। सुनो , बहुत बोलते हो, तुम तो जीत हो न। हार क्यों जाते हो फिर। "तुम्हारी हार की मांग सुनकर" Absurd by Jitendra Rai "Jeet" Uttarakhand literature, Laghu katha, Garhwali sahity, pahadi sahity, लघु कथाएं, जीत, कहानियां, उत्तराखंडी साहित्य।